'बंगला बोलने पर बांग्लादेशी, मछली खाने पर मुगल'
कोलकाता। लोकसभा में बजट पर चर्चा के दौरान तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी ने केंद्र सरकार और भाजपा पर तीखा हमला बोला। अपने संबोधन में उन्होंने देश में व्याप्त 'दो भारत' की स्थिति का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि एक तरफ राष्ट्र को विश्वगुरु बनाने का दावा किया जा रहा है, तो दूसरी तरफ खान-पान, भाषा और संस्कृति के आधार पर देश के ही नागरिकों को बांटने और अपमानित करने का प्रयास हो रहा है।
अभिषेक बनर्जी ने बेहद आक्रामक तेवर अपनाते हुए कहा कि आज के दौर में बंगला बोलना और मछली खाना भी किसी विशेष वर्ग के निशाने पर आने का कारण बन गया है। संसद के पटल से उन्होंने सवाल उठाया कि क्या मातृभाषा का सम्मान करना अब संदेह का विषय है? उन्होंने कहा कि अगर कोई बंगला बोलता है तो उसे तुरंत बांग्लादेशी करार दे दिया जाता है और खान-पान की पसंद के आधार पर उसे मुग़ल कहकर संबोधित किया जाता है। जय बंगला का नारा या राष्ट्रगान के रचयिता की भाषा बोलना आज शक की नजर से देखा जा रहा है। अभिषेक ने इस दौरान एक अमेरिकी स्टैंडअप कॉमेडियन के प्रसिद्ध दो भारत के व्यंग्य का उल्लेख करते हुए कहा कि वह महज कॉमेडी नहीं थी, बल्कि आज के कड़वे सच का आईना थी। उन्होंने स्वयं को उस भारत का प्रतिनिधि बताया जिसे राजनीतिक रूप से हाशिए पर धकेलने की कोशिश हो रही है। भाषण के दौरान अभिषेक बनर्जी ने बंगाल के लंबित बकाया राशि के मुद्दे पर केंद्र सरकार को जमकर घेरा। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक मतभेदों की सजा बंगाल की 10 करोड़ जनता को दी जा रही है।
उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि बंगाल का एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का बकाया अभी भी केंद्र के पास लंबित है, जिसके कारण मनरेगा, आवास योजना और जल जीवन मिशन जैसी बुनियादी योजनाएं प्रभावित हो रही हैं। उन्होंने सवाल किया कि क्या सहकारी संघवाद में पीने के पानी और गरीबों के घरों पर राजनीति करना जायज है? केंद्र की राष्ट्रीय सुरक्षा और घुसपैठ नीति पर प्रहार करते हुए टीएमसी नेता ने कहा कि एक ओर सीमाओं के सुरक्षित होने का दावा किया जाता है, वहीं दूसरी ओर दिल्ली और पहलगाम जैसे क्षेत्रों में हथियारबंद घुसपैठियों की मौजूदगी सुरक्षा पर सवाल खड़े करती है। उन्होंने विशेष गहन पुनरीक्षण और नागरिकता से जुड़े मुद्दों पर भी चिंता जताई। अभिषेक ने कहा कि आज देश के भीतर ही नागरिकों को अपनी पहचान और दशकों पुराने वोट देने के अधिकार को साबित करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। महंगाई, जीएसटी की विसंगतियों और विदेश नीति पर केंद्र को कठघरे में खड़ा करते हुए उन्होंने इस बजट को बंगाल के प्रति उपेक्षापूर्ण करार दिया।